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बुरा लगता है !

गर्मियों का मौसम बहुतों के लिए बड़ा ही बेचैनी भरा अनुभव लेकर आता है। जब गर्मियां अपनी जवानी पर होती हैं तो लोग पंखे और कूलर का सहारा लिया करते हैं। दिनों दिन बढ़ती प्रदूषण से गर्मी में और जवानी आ गई है।अब तो पंखे भी लू के ताप से गरम हवा बिखेरतीं है। ऐसे में लोग वातानुकूलन का सहारा लेते हैं।  " लेकिन ध्यान रहे , तपतपाती गर्मीयों में भी कुछ ऐसे भी होते हैं जो हमेशा कार्यरत रहते हैं। अदाहरण के तौर पर किसान को लिया जा सकता है। ऐसे अनेकों उदाहरण आपको मिल जाएंगे। इन्हीं लोगों को समर्पित अपने दिल से निकली कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूँगा ၊ पंक्तियाँ हैं : बुरा लगता है ! बुरा लगता है ,  जब AC लगे शीतल कमरे में बैठा,  मन में एक खयाल आता है ,  कि कोई गर्मियों के धूप से बचने के लिए   उम्मीदों का छाव ढूढ़ रहा होगा। बुरा लगता है ! बुरा लगता है ,  जब AC लगे शीतल कमरे में बैठा,  मन में एक खयाल आता है ,  कि कोई पिता तपतपाती गर्मी के चिलचिलाती धूप सहकर अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य की कामना कर रहा होगा। बुरा लगता है ! बुरा लगता ह...

ऐ बिहार।

हिम्मत तो नहीं होती, कि कुछ लिख पाऊं उन माताओं के लिए जिन्होंने अपने लाल खोए हो, लेकिन मन के ठंढक के लिए कपकपाती हाथों से लिखे कुछ पंक्तियाँ साझा करना चाहूँगा ,  पंक्तियाँ है :- ऐ बिहार सुन जरा उस माँ की पुकार, लूट गए जिनके घर संसार, ऐ बिहार सुन जरा सुन उस माँ की पुकार । मोहल्ले में जब मचा था मौत का शोर , पूँछ रहे थे वो मैच स्कोर, अरे कुछ तो शर्म करो मेरे यार ၊ जरा पूँछो उनसे , लूट गए जिनके घर संसार ၊ 153 गोदें सूनी हुई ,  घर का चिराग बुझा , अरे अब तो कुछ करो सरकार ၊ ज़रा पूँछो उनसे , लूट गए जिनके घर संसार ၊ अरे कब तक पुरातन सीढ़ियाँ चढ़ अपने को ऊँचा बतलाओगे, अरे अब तो कुछ बदल दो सरकार ၊ जरा पूँछो उनसे , लूट गए जिनके घर संसार ၊ जवाना बदल रहा है मेरे यार , बनाओ अपना एक नया बिहार ,  जहाँ हो जीवन सुखमय ,  और न हो उन माँ जैसा कोई लाचार ၊ अरे अब तो बदल जाओ बिहार ,  अब तो बदल जाओ बिहार ၊ ज़रा  पूँछो उनसे , लूट गए जिनके घर संसार ၊ ऐ बिहार सुन ज़रा उन माँ की पुकार..... ........................

इक्षा ! कुछ कर गुजरने की ।

जग में आए हैं तो कुछ लेकर जायेंगे, यू ही नहीं हम मर कर जायेंगे । रास्ते चाहे जो भी हो उसपर फतह कर जायेंगे, सफलता की सीढ़ी को अपने कदमों में गिरा जायेंगे। जग में आए हैं तो कुछ लेकर जायेंगे , यू ही नहीं हम मर कर जायेंगे। हम वो सूखे पत्ते नहीं , जिसे पवन का एक झोंका उड़ा ले जाए, हौसले बुलंद हैं हमारे आंधियों से भी लड़ कर जायेंगे। जग में आए हैं तो कुछ लेकर जायेंगे,  यू ही नहीं हम मर कर जायेंगे। चाहे हजारों मुश्किलें हमारी राह रोके, कठिनाइयां हमारे सर चढ़ बोले , हम रुकेंगे नहीं , हम थकेंगे नहीं, अपने हौसलों कि उड़ान से आसमान भी छोटा कर जायेंगे। जग में आए हैं तो कुछ लेकर जायेंगे, यू ही नहीं हम मर कर जायेंगे। अपने लक्ष्य को हम अपना दृढ़ संकल्प बनाएंगे, हंसते हंसते उसके लिए आग का दरिया भी पार कर जायेंगे, अपने अदम्य ताकत से हम बंजर में फूल खिलाएंगे। जग में आए हैं तो कुछ लेकर जायेंगे, यू ही नहीं हम मर कर जायेंगे। धन्यवाद आपको ये कविता कैसी लगी कॉमेंट सेक्शन में जरूर लिख कर पोस्ट करे।और हमसे इसे लिखने में कोई भी त्रुटियां हुई है तो इसे भी जरूर अवगत करवाए हमें अच्छ...

हम बड़े ही क्यूं हुए?

हम बड़े ही क्यूं हुए? वो बचपन का संसार,जहां करते थे नादानियां आपार, आज जब हुए बड़े तो दिल ने पूछा ये सवाल, हम बड़े ही क्यूं हुए? वो घर वाला संसार ,वो मां के आंचल का प्यार , वो पिता का दुलार,पर फिर दिल ने पूछा ये सवाल, हम बड़े ही क्यूं हुए? वो अपनों से तकरार, नन्हे दोस्तों से कि गई मार, फिर रूठने मनाने का इंतजार,आज जब हम हुए बड़े तो दिल ने पूछा ये सवाल , हम बड़े ही क्यूं हुए? वो स्कूल जाने के नखरे, वो पिता का डरावना फटकार, आज सोचकर लगता है ,वो प्यार था आपर,मगर फिर दिल ने पूछा ये सवाल, हम बड़े ही क्यूं हुए?